सुसंस्कृत सौदा…

लघु कथा 

 डॉ. अनिता जैन ‘विपुला’, उदयपुर 


मंडप में अग्नि प्रज्वलित थी— साक्षी, शुद्ध, निर्विकार।
मंत्र गूँज रहे थे— ‘अटूट बंधन।’
किन्तु धीमी फुसफुसाहटों में एक ही परिगणना चल रही थी— कितना प्राप्त हुआ, कितना न्यून रह गया।
विदा के साथ ही प्रेम का मुखावरण उतर गया।

उसने शांत स्वर में कहा— ‘अवमान की परिपूर्ति अनिवार्य है।’

और परिपूर्ति के लिए उसने उसकी देह को ही साधन बना दिया। कैमरे की शीतल दृष्टि खुली; भय स्क्रीन पर स्थिर हो गया। हर प्रेषण के साथ वह स्त्री से घटकर ‘देय’ बनती गई—

एक ऐसा ऋण, जिसमें उसका अस्तित्व ही गिरवी था। फिर एक रात हिंसा ने सीमा नहीं, श्वास तोड़ दी। प्रभात हुआ। द्वार खुले। 

लोग आए—
कुछ ने शोक ओढ़ा, कुछ ने मौन।
अभिलेख में बस एक पंक्ति अंकित हुई— ‘असामान्य मृत्यु।’

पर असामान्य क्या था?
मृत्यु— या वह समाज, जो विवाह को अब भी संस्कार कहता है, जबकि अनेक घरों में वह केवल सुसंस्कृत वसूली बनकर रह गया है। अग्नि बुझ गई, पर सत्य यह है— वह चिता में नहीं, परंपराओं में अब भी जल रही है और सबसे भयावह यह कि अग्नि अब भी प्रज्वलित होती है, मंत्र अब भी गूँजते हैं,

पर बदलता नहीं— दुल्हन का मूल्य।
शायद इसलिए हर मंडप के धुएँ में एक अदृश्य प्रश्न तैरता रहता है—

हम विवाह रचा रहे हैं, या एक सुसंस्कृत सौदे को वैधता दे रहे हैं?

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