भरतपुर में खराब सड़कों और बंद स्ट्रीट लाइटों से लोगों की परेशानी बढ़ी। बिजली बिल में अर्बन सेस वसूली और विभागीय जवाबदेही पर सवाल।
भरतपुर। शहर में रात के समय सड़क पर निकलना कई इलाकों में महज सफर नहीं, बल्कि जोखिम उठाने जैसा हो गया है। कहीं सड़क खुदी पड़ी है, कहीं गहरे गड्ढे रास्ता रोकते हैं और जहां इनसे बचकर निकलने के लिए रोशनी की जरूरत है, वहीं स्ट्रीट लाइटें बंद मिलती हैं। ऐसे में सवाल सिर्फ अंधेरी सड़कों का नहीं, उस व्यवस्था का भी है जो रोशनी के नाम पर शुल्क वसूलने के बावजूद नागरिकों को सुरक्षित रास्ते उपलब्ध कराने में नाकाम नजर आ रही है।
भरतपुर में सर्कुलर रोड से लेकर बाहरी कॉलोनियों तक पिछले करीब दो वर्षों से चल रहे सीवर, गैस पाइपलाइन और पेयजल लाइन के काम ने कई सड़कों की सूरत बिगाड़ रखी है। गोलपुरा बाईपास, गोलपुरा रोड और मुरवारा रोड सहित विभिन्न स्थानों पर सड़क निर्माण और चौड़ीकरण के चलते भी आवागमन प्रभावित है। दिन में इन रास्तों पर गड्ढों से बचना चुनौती है, जबकि रात होते ही पर्याप्त रोशनी नहीं मिलने से परेशानी और बढ़ जाती है।
विडंबना यह है कि जिन सड़कों पर राहगीरों को सुरक्षित रास्ता दिखाने के लिए स्ट्रीट लाइटों की सबसे ज्यादा जरूरत है, वहां भी रोशनी की व्यवस्था भरोसेमंद नहीं है। नतीजा यह कि खराब सड़क और बंद लाइटें मिलकर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा रही हैं।
कहीं खंभे खाली, कहीं लाइटें बेअसर
शहर की स्ट्रीट लाइट व्यवस्था की समस्या केवल खराब बल्ब या बंद लाइटों तक सीमित नहीं है। कई जगह स्ट्रीट लाइट के लिए अलग खंभे नहीं लगाए गए हैं। कुछ स्थानों पर बिजली वितरण कंपनी के खंभों पर लाइटें लगी हैं, जबकि अन्य जगह नगर निगम के पोल हैं। इसके बावजूद ऐसे बिजली खंभे भी हैं, जिन पर स्ट्रीट लाइट मौजूद नहीं है।
जहां लाइटें लगी हैं, वहां भी सभी से पर्याप्त रोशनी मिलने की स्थिति नहीं है। कई स्थानों पर पुरानी लाइटें अपेक्षित प्रकाश नहीं दे पा रही हैं। स्थानीय स्तर पर करीब 40 प्रतिशत तक लाइटें खराब या बंद रहने की शिकायतें सामने आती रही हैं। इस दावे की विभागीय जांच हो तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
कुछ इलाकों में हर तीसरे या चौथे खंभे की लाइट बंद होने की शिकायत है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है, जो रात में पैदल या दुपहिया वाहनों से इन रास्तों से गुजरते हैं। अंधेरे में सड़क के गड्ढे और रास्ते की बाधाएं समय रहते दिखाई नहीं देने का खतरा बना रहता है।
लाइट खराब हो तो नागरिक करें शिकायत, निगरानी कौन करेगा?
स्ट्रीट लाइट व्यवस्था का एक और कमजोर पहलू शिकायतों पर निर्भरता है। आरोप है कि लाइट बंद होने पर नागरिक को खुद शिकायत दर्ज करानी पड़ती है। इसके लिए संबंधित खंभे की संख्या बतानी होती है। शिकायत करने के बाद भी मरम्मत में कई दिन लगने की बात सामने आती है, जबकि कुछ जगहों पर समस्या लंबे समय तक बनी रहती है।
यहां सवाल उठता है कि क्या शहर की लाइटों की नियमित जांच करना संबंधित विभागों की जिम्मेदारी नहीं है? यदि किसी इलाके में कई लाइटें बंद हैं, तो क्या उनकी पहचान के लिए विभागीय निरीक्षण नहीं होना चाहिए?
हर नागरिक को शिकायत दर्ज कराने का तरीका या संबंधित अधिकारी की जानकारी हो, यह जरूरी नहीं। बहुत से लोग अपने घर के आसपास की लाइट खराब होने पर ही शिकायत करते हैं। दूसरी गलियों या मुख्य रास्तों पर अंधेरा बना रहे तो भी समस्या तब तक सामने नहीं आती, जब तक कोई इसकी शिकायत न करे। ऐसी स्थिति में सवाल केवल मरम्मत में देरी का नहीं, बल्कि उस निगरानी व्यवस्था का भी है, जो बंद लाइटों की पहचान कर समय पर उन्हें ठीक कराने के लिए जिम्मेदार है।
15 पैसे प्रति यूनिट के सेस का हिसाब कौन देगा?
स्ट्रीट लाइटों को लेकर नाराजगी की बड़ी वजह बिजली बिल में इस सुविधा के नाम पर प्रति यूनिट 15 पैसे की दर से अर्बन सेस वसूले जाने का दावा है। नागरिकों का सवाल है कि यदि इस मद में शुल्क लिया जा रहा है, तो उसके अनुरूप सड़कों पर रोशनी और लाइटों के रखरखाव की व्यवस्था भी सुनिश्चित होनी चाहिए। आखिर कितनी स्ट्रीट लाइटें चालू हैं? कितनी खराब पड़ी हैं? कितनी जगहों पर लाइटें लगाई ही नहीं गई हैं? शिकायत मिलने के बाद मरम्मत में कितना समय लगता है? इन सवालों के जवाब के बिना व्यवस्था की वास्तविक स्थिति और उसकी जवाबदेही तय करना मुश्किल है। अर्बन सेस की वसूली और स्ट्रीट लाइटों के रखरखाव के बीच क्या व्यवस्था है, इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आना भी जरूरी है। नगर निगम और बिजली वितरण कंपनी की जिम्मेदारियों के बीच समन्वय कितना प्रभावी है, यह भी जांच का विषय है।
अब शिकायतों का इंतजार नहीं, नियमित जांच जरूरी
भरतपुर की इस समस्या का समाधान केवल खराब लाइट बदल देने तक सीमित नहीं होना चाहिए। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें हर वार्ड की स्ट्रीट लाइटों का सर्वे हो, बंद और खराब लाइटों के साथ उन स्थानों की भी पहचान की जाए जहां रोशनी की व्यवस्था नहीं है। इसके साथ शिकायतों के निस्तारण की समय-सीमा तय करने और नियमित निरीक्षण की व्यवस्था लागू करने की जरूरत है, ताकि नागरिकों को हर बार खुद समस्या बताने के लिए मजबूर न होना पड़े। शहर की सड़कों की बदहाली और स्ट्रीट लाइटों की खराब स्थिति दो अलग-अलग समस्याएं जरूर हैं, लेकिन रात के समय दोनों का असर एक साथ दिखाई देता है। ऐसे में सड़क सुधार के कार्यों के साथ रोशनी की व्यवस्था पर भी समान गंभीरता से ध्यान देना जरूरी है।
भरतपुर के नागरिकों का सवाल सीधा है—जब बिजली बिल में स्ट्रीट लाइट के नाम पर शुल्क लिया जा रहा है, तो सड़कों पर पर्याप्त रोशनी की जिम्मेदारी कौन निभाएगा? अंधेरे और गड्ढों के बीच सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना आखिर किस विभाग की प्राथमिकता है? इन सवालों का जवाब केवल दावों से नहीं, बल्कि नियमित निगरानी, समयबद्ध मरम्मत और जमीन पर दिखाई देने वाले सुधार से ही मिलेगा।
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