जोधपुर
राजस्थान में पुलिस वालों ने सत्तर साल के एक बुजुर्ग के साथ ऐसा षड़यंत्र रचा कि बेगुनाह होते हुए भी बुजुर्ग को पांच माह जेल की सलाखों में रहना पड़ा। सीनियर पुलिस अधिकारियों की जांच में पाया गया कि एक SHO सहित चार पुलिस वालों ने षड्यंत्र रच कर इस बुजुर्ग के घर अफीम रख दी थी जिसके कारण उसे पांच महीने जेल में रहना पड़ा। मानवाधिकार आयोग ने मामले को गंभीरता से लेते हुए चारों पुलिसवालों पर 5 लाख का जुर्माना लगाते हुए आदेश दिए हैं कि सरकार चाहे तो जुर्माना इनके वेतन से वसूल कर सकती है।
आयोग के अध्यक्ष गोपाल कृष्ण व्यास ने अपने आदेश में इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला बताया है। आयोग ने आदेश सुनाया। 70 वर्षीय पीड़ित भाकर राम को पांच लाख रुपए 2 माह की अवधि में क्षतिपूर्ति देने के आदेश दिए। साथ ही राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता दी कि क्षतिपूर्ति की राशि के लिए दो लाख रुपए जांबा के तत्कालीन थाना अधिकारी और मामले में दोषी थानेदार सीताराम के वेतन से दिया जाए। एक लाख रुपए कॉन्स्टेबल करनाराम और एक लाख रुपए कॉन्स्टेबल भगवानाराम से वसूल कर सकते हैं। आरोप है कि पुलिसकर्मियों ने मिलकर एक 70 साल के व्यक्ति को झूठे एनडीपीएस एक्ट में फंसाया था।
पांच साल तक किसी थाने में भी नहीं लग पाएंगे
आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति के व्यास ने सरकार को आदेश दिया कि वह अगले पांच साल के लिए किसी भी पुलिस थाने के थाना प्रभारी के रूप में दोषी पुलिस निरीक्षक की नियुक्ति न करे। अन्य दोषी पुलिसकर्मियों को भी किसी थाने में नहीं लगाने के आदेश दिए। एक सीनियर पुलिस अफसर की जांच को संज्ञान में लेते हुए न्यायमूर्ति व्यास ने बुजुर्ग को क्लीन चिट दी। उन्होंने फलोदी निवासी भाकर राम विश्नोई की याचिका पर सुनवाई करते हुए उन्हें बरी किया है। याचिका के जरिए कहा गया था कि उन्हें अफीम रखने और व्यापार करने के झूठे मामले में फंसाया गया है।
जांच में सामने आया सच
याचिका दायर होने के बाद पैनल के आदेश पर सीनियर पुलिस अधिकारियों ने जांच में पाया कि बिश्नोई को जोधपुर के जांबा पुलिस स्टेशन के तत्कालीन एसएचओ सीताराम ने 2012 में अपने थाने के दो कांस्टेबलों भगवानाराम और करनाराम के साथ मिलीभगत से फंसाया था। पुलिस वालों ने उसके घर से 3 किलो अफीम की बरामदगी दिखाते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया था और उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया था। बिश्नोई के खिलाफ प्राथमिकी के आधार पर मजिस्ट्रेट ने उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया था और उन्हें पांच महीने से अधिक समय तक जेल में रहना पड़ा था।
न्यायमूर्ति ने कहा- ये मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला
न्यायमूर्ति व्यास ने कहा कि यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का एक गंभीर मामला है, जिसमें एक 70 वर्षीय व्यक्ति को एक अपराध में फंसाने वाले पुलिसकर्मियों द्वारा रची गई साजिश के तहत पांच महीने तक जेल में रहना पड़ा था। उन्होंने कहा कि पीड़ित को जेल के कारण हुई मानसिक पीड़ा और समाज में उनकी छवि और प्रतिष्ठा के नुकसान का आकलन करना संभव नहीं है।
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग के फैसले में पुलिस के उच्च अधिकारियों द्वारा मामले में निष्पक्ष जांच करने के लिए पुरस्कृत करने के आदेश दिए
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