फाइलों के बोझ तले दबा राजस्थान हाईकोर्ट: क्या था वो फरमान, जिसे बदलने के लिए खुद अदालत को लगानी पड़ी अर्जी?

राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक फाइलों के रखरखाव में आ रही दिक्कतों के चलते 5 अगस्त के अपने पुराने आदेश का पहला पैराग्राफ वापस ले लिया है। जानें पूरा मामला।

जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट के गलियारों में कुछ समय पहले एक ऐसा आदेश आया था, जिसने न्यायिक कर्मचारियों और वकीलों की दिनचर्या में हलचल मचा दी थी। फाइलिंग सिस्टम को दुरुस्त करने के नाम पर एक नया नियम बनाया गया, लेकिन चंद हफ्तों में ही इस व्यवस्था ने ऐसा प्रशासनिक संकट पैदा किया कि खुद हाईकोर्ट प्रशासन को अपनी ही अदालत में अर्जी लगानी पड़ गई।

आइए जानते हैं कि आखिर वह कौन सा आदेश था, जिसने व्यवस्था सुधारने के बजाय सिरदर्द बढ़ा दिया और अदालत को अपने ही कदम पीछे खींचने पड़े।

वह नया नियम: जिसने बढ़ा दिया कागजी झंझट

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बीती 5 अगस्त 2026 को राजस्थान हाईकोर्ट की एक बेंच ने न्यायिक कामकाज को लेकर एक सख्त निर्देश जारी किया था। इसके तहत यह नियम बनाया गया था कि कोर्ट में जितनी भी अर्जियां (Applications) दाखिल की जाएंगी, उन्हें मुख्य केस की मूल फाइल के साथ नत्थी (Attach) करने के बजाय एक बिल्कुल अलग फोल्डर में रखा जाएगा।

इस अलग फोल्डर को मुख्य फाइल के साथ अलग से जोड़कर पेश करना अनिवार्य कर दिया गया था। मकसद शायद यह था कि हर एक अर्जी करीने से अलग नजर आए, लेकिन कागजी दस्तावेजों के बीच यह प्रयोग पूरी तरह उलझ गया।

जब खुद हाईकोर्ट प्रशासन को देनी पड़ी अपनी अदालत में अर्जी

नया नियम लागू होने के बाद जमीनी स्तर पर प्रशासनिक दिक्कतें सामने आने लगीं। स्थिति यह हो गई कि फाइलों के रखरखाव (Maintenance) और दस्तावेजों को सहेजने का काम पहले के मुकाबले काफी जटिल और बोझिल हो गया।

बार-बार दस्तावेजों की जांच, उनका संकलन और उन्हें सुरक्षित रखने की प्रक्रिया में दोहराव होने लगा, जिससे कोर्ट का प्रशासनिक अमला परेशान हो गया। जब इस व्यवस्था को चलाना मुश्किल हो गया, तब खुद राजस्थान हाईकोर्ट प्रशासन ने इस आदेश को वापस लेने के लिए एक रिट विविध अर्जी दाखिल की।

बिना सुने दिया गया था आदेश, अब अदालत ने की बड़ी भूल सुधार

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट डॉ. सचिन आचार्य ने अदालत को बताया कि इस व्यवस्था से फाइलों को संभालने में बेवजह का प्रशासनिक दबाव और काम बढ़ रहा है।

अदालत ने यह भी गौर किया कि 5 अगस्त का वह निर्देश सीधे तौर पर हाईकोर्ट प्रशासन को सुने बिना ही पारित कर दिया गया था। इसके अलावा, जिस मूल रिट याचिका (नाथा राम बनाम राजस्थान सरकार) के हवाले से यह सब शुरू हुआ था, उसका निस्तारण पहले ही हो चुका था और राज्य सरकार को भी इस पुराने निर्देश से कोई सरोकार या आपत्ति नहीं थी।

अदालत का फैसला: हटाना पड़ा विवादित पैराग्राफ

परिस्थितियों की गंभीरता और प्रशासनिक व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए चीफ जस्टिस की बेंच ने बिना देर किए बड़ा फैसला लिया।

अदालत ने 5 अगस्त 2026 के उस आदेश का पहला पैराग्राफ पूरी तरह वापस ले लिया, जिसमें अर्जियों को अलग फोल्डर में रखने की बाध्यता तय की गई थी। इस आदेश के वापस होने के साथ ही न्यायिक फाइलों के रखरखाव को लेकर बनी असमंजस की स्थिति फिलहाल समाप्त हो गई है।

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