जिस दुनिया के नक्शे को हम बचपन से देखते आए हैं, उसमें अफ्रीका अपने असली आकार से छोटा और ग्रीनलैंड बड़ा दिखता है। UN में Mercator Map की जगह Equal Earth Map अपनाने की बहस क्यों छिड़ी है, जानिए पूरी कहानी।
क्या होगा अगर आपको पता चले कि बचपन से किताबों में देखते आए दुनिया के नक्शे ने आपको दुनिया की असली तस्वीर कभी दिखाई ही नहीं?
जिस अफ्रीका को हम नक्शे पर अपेक्षाकृत छोटा देखते हैं, वह असल में ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। लेकिन सदियों पुराने विश्व मानचित्र को देखिए तो दोनों लगभग एक जैसे आकार के नजर आते हैं! अब यही सवाल पूरी दुनिया के सामने खड़ा हो गया है।
450 साल से दुनिया को एक खास नजरिए से दिखाने वाले मर्केटर मैप को बदलने की मांग संयुक्त राष्ट्र महासभा तक पहुंच गई है। अगर प्रस्ताव को समर्थन मिलता है तो आने वाले समय में स्कूलों की किताबों से लेकर दुनिया को देखने के हमारे तरीके तक में बड़ा बदलाव आ सकता है।
1569 में बना नक्शा, जिसे आज भी दुनिया सच मानती है
साल था 1569। फ्लेमिश मानचित्रकार गेरार्डस मर्केटर ने एक ऐसा नक्शा बनाया, जो समुद्री यात्रियों के लिए बेहद उपयोगी था। समुद्र में दिशा तय करने के लिए यह शानदार था, लेकिन गोल पृथ्वी को सपाट कागज पर उतारते-उतारते दुनिया की तस्वीर बदल गई। ध्रुवों के पास के इलाके नक्शे पर फैलते चले गए और भूमध्य रेखा के आसपास के विशाल भूभाग सिकुड़ते नजर आने लगे।
नतीजा?
ग्रीनलैंड विशाल दिखने लगा… यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपने वास्तविक आकार से कहीं बड़े नजर आने लगे… जबकि अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और भारत जैसे इलाके नक्शे पर दब गए।
अफ्रीका और ग्रीनलैंड को एक बार फिर देखिए!
यही इस पूरे विवाद का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा है। मर्केटर मैप पर ग्रीनलैंड और अफ्रीका को देखकर लगता है कि दोनों का आकार लगभग बराबर है।
लेकिन वास्तविकता?
अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3.03 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। इसका फैलाव इतना विशाल है कि इसके भीतर अमेरिका, चीन, भारत, जापान, मैक्सिको और लगभग पूरा यूरोप एक साथ समा सकता है।
फिर सवाल उठता है—अगर अफ्रीका इतना बड़ा है तो नक्शे में छोटा क्यों दिखता रहा?
अब अफ्रीका ने कहा—दुनिया हमें सही आकार में देखे
इसी सवाल के साथ अफ्रीकी देशों ने #CorrectTheMap अभियान को आगे बढ़ाया है। टोगो की अगुवाई और अफ्रीकी संघ के समर्थन से मांग उठाई गई है कि दुनिया को अब उस नक्शे से बाहर निकलना चाहिए, जो सदियों पहले समुद्री यात्राओं के लिए बनाया गया था। उनका कहना है कि यह सिर्फ भूगोल की गलती नहीं है, बल्कि दुनिया को देखने के नजरिए का सवाल भी है।
कई आलोचक इसे ‘कार्टोग्राफिक कोलोनियलिज्म’ से जोड़ते हैं—यानी नक्शे पर दुनिया को इस तरह दिखाना, जिससे कुछ क्षेत्र जरूरत से ज्यादा बड़े और प्रभावशाली दिखाई दें, जबकि दूसरे छोटे नजर आएं।
अब सामने आया Equal Earth Map
मर्केटर मैप के विकल्प के रूप में जिस नक्शे की चर्चा है, उसका नाम है Equal Earth Map।
इसे 2018 में विकसित किया गया था और इसका मकसद दुनिया के देशों और महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखाना है। यानी अगर अफ्रीका विशाल है तो नक्शे पर भी विशाल दिखेगा। ग्रीनलैंड छोटा है तो उसे कृत्रिम रूप से विशाल नहीं बनाया जाएगा।
अगर दुनिया ने नया नक्शा अपना लिया तो क्या बदल जाएगा?
सोचिए, आने वाली पीढ़ी स्कूल में दुनिया का वह नक्शा देखे, जिसमें अफ्रीका अपनी असली विशालता के साथ दिखाई दे तो:
- एटलस बदल सकते हैं।
- स्कूलों की किताबों में विश्व मानचित्र बदल सकते हैं।
- प्रकाशक और शैक्षणिक संस्थान नए प्रोजेक्शन को अपना सकते हैं।
- डिजिटल दुनिया में भी ग्लोबल व्यू के लिए अलग तरह के नक्शों को प्राथमिकता मिलने की बहस तेज हो सकती है।
लेकिन सबसे बड़ा बदलाव शायद कागज पर नहीं होगा।
बदलाव हमारे दिमाग में होगा।
क्योंकि जिस दुनिया को हम अब तक छोटा-बड़ा समझते आए हैं, शायद वह वास्तव में वैसी थी ही नहीं जैसी हमें नक्शे पर दिखाई गई।
UN में उठी यह बहस सिर्फ दुनिया का नक्शा बदलने की नहीं है… यह सवाल है कि आखिर दुनिया को देखने का हमारा नजरिया किसने बनाया और क्या अब उसे बदलने का वक्त आ गया है?
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