विश्व पर्यावरण दिवस पर कुतुब मीनार पर गोडावण की कहानी का भव्य प्रोजेक्शन शो आयोजित किया गया। संरक्षण प्रयासों और राजस्थान में बढ़ती उम्मीदों को लेकर जागरूकता फैलाने की पहल।
नई दिल्ली। ऐतिहासिक कुतुब मीनार पर इस बार इतिहास नहीं, बल्कि भारत के सबसे दुर्लभ पक्षियों में से एक गोडावण की कहानी रोशनी बनकर उभरी। विश्व पर्यावरण दिवस पर आयोजित विशेष प्रोजेक्शन शो ने हजारों लोगों का ध्यान उस पक्षी की ओर खींचा, जिसकी घटती संख्या वर्षों से वन्यजीव संरक्षण के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
गोडावण, जिसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के नाम से भी जाना जाता है, कभी भारत का राष्ट्रीय पक्षी बनने की चर्चा में था। लेकिन समय के साथ इसके प्राकृतिक आवास सिकुड़ते गए और इसकी संख्या लगातार घटती चली गई। अब संरक्षण प्रयासों के चलते इस दुर्लभ पक्षी की वापसी की उम्मीद फिर से मजबूत होती दिखाई दे रही है।
इसी संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए विश्व पर्यावरण दिवस पर कुतुब मीनार पर एक भव्य प्रोजेक्शन शो आयोजित किया गया। गोडावण एस्ट्यूरी प्रीमियम वॉटर के सहयोग से हुए इस आयोजन में पक्षी के संघर्ष, संरक्षण और पुनर्वास की कहानी को आकर्षक दृश्य माध्यम से प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को गोडावण के महत्व और उसके संरक्षण की आवश्यकता के प्रति जागरूक करना था।
गोडावण को हाल ही में राष्ट्रीय स्तर पर भी नई पहचान मिली, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ के 133वें एपिसोड में इसका उल्लेख किया। उन्होंने इसे वन्यजीव संरक्षण और संकटग्रस्त प्रजातियों को बचाने के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।
ग्रामोदय सामाजिक संस्थान के अध्यक्ष केदार श्रीमाल ने कहा कि गोडावण संरक्षण की सबसे बड़ी ताकत विभिन्न पक्षों का सामूहिक सहयोग है। उनके अनुसार स्थानीय समुदाय, संरक्षण विशेषज्ञ, निजी क्षेत्र, वन विभाग और अन्य सरकारी एजेंसियां मिलकर इस पक्षी और इसके प्राकृतिक आवास की सुरक्षा को मजबूत बना रहे हैं। यही साझेदारी भविष्य के लिए नई उम्मीद जगा रही है।
राजस्थान से मिली नई उम्मीद
गोडावण संरक्षण अभियान को हाल ही में राजस्थान से भी बड़ी मजबूती मिली है। राज्य ने मई महीने में पहली बार 21 मई को ‘गोडावण दिवस’ मनाया। इस अवसर पर संरक्षण प्रयासों और प्रजनन कार्यक्रमों से जुड़े उत्साहजनक परिणाम सामने आए। संरक्षित केंद्रों में नए चूजों के जन्म ने इस दुर्लभ पक्षी के भविष्य को लेकर उम्मीदें बढ़ा दी हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार गोडावण की संख्या में दिख रहा सकारात्मक बदलाव लंबे समय से चल रहे वैज्ञानिक प्रयासों का परिणाम है। प्राकृतिक घास के मैदानों का पुनर्विकास, घोंसलों की सुरक्षा, पानी की बेहतर उपलब्धता, प्रजनन एवं हैचरी कार्यक्रमों को मजबूत करना और शिकारी जीवों के खतरे को कम करने जैसे कदमों ने संरक्षण अभियान को नई दिशा दी है।
बिश्नोई समाज बना संरक्षण की ताकत
गोडावण संरक्षण की इस कहानी में स्थानीय समुदायों की भूमिका भी किसी नायक से कम नहीं रही। विशेष रूप से बिश्नोई समुदाय और गोडावण के आवास क्षेत्रों के आसपास रहने वाले लोगों ने वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों के साथ मिलकर घोंसलों की निगरानी, प्रजनन स्थलों की सुरक्षा और सुरक्षित वातावरण तैयार करने में अहम योगदान दिया है।
इन्हीं सामूहिक प्रयासों का परिणाम है कि कभी विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुका गोडावण अब फिर से उम्मीद की उड़ान भरता दिखाई दे रहा है।
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