कटे वृक्ष सिमटते पर्वत…

कटे वृक्ष सिमटते पर्वत, पीड़ा देने वाले हैं
एक दिन जब सब मिट जांयेंगे, पड़ें जान के लाले है।

मंद-मंद क्यों मुस्काते हो…

मंद-मंद क्यों मुस्काते हो
हंसने में क्यों शर्माते हो,
खुल के हंस लो आज प्यारे

यादें…

यादें बहुत खुबसूरत होती हैं
न लड़ती हैं न झगड़ती हैं

वो योगी सन्यासी…

अट्ठारह सौ तिरसठ जनवारी 12 को
धरा पर हुआ विशिष्ट आनंद

दीवारों के बीच चुन गए…

गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों ने
दिया आज अपना बलिदान