कटे वृक्ष सिमटते पर्वत, पीड़ा देने वाले हैं एक दिन जब सब मिट जांयेंगे, पड़ें जान के लाले है।
मंद-मंद क्यों मुस्काते हो हंसने में क्यों शर्माते हो, खुल के हंस लो आज प्यारे
यादें बहुत खुबसूरत होती हैं न लड़ती हैं न झगड़ती हैं
अट्ठारह सौ तिरसठ जनवारी 12 को धरा पर हुआ विशिष्ट आनंद
गुरु गोविंद सिंह के पुत्रों ने दिया आज अपना बलिदान