रिश्तों की धरोहर…

कविता  डॉ. विनीता राठौड़ विपदा की घड़ी कैसी है आईसाथ में महामारी बड़ी है लाई संपूर्ण  जगत  खड़ा  है  आजकलवर्तमान और भविष्य के दोराहे पर देख कर ऐसी विकट परिस्थिति…

जीवों से सीखो

अपने बचपन में सीखी थी,, यह सुन्दर कविता…

बेड़ा पार…

हे कृष्ण गोपाल!, हे नंद के लाल…

जीवन की डोर को थामे रखना…

जीवन की डोर को थामे रखना …

प्रथम गुरू यूँ ही नहीं कहलाती…

माँ तो आखिर माँ है होती…