‘जब गधे-ऊंट पर निकलता है ‘होली का दूल्हा’ | भुसावर की 250 साल पुरानी अनोखी परंपरा, बिना दुल्हन के निकलती है बारात

भरतपुर (Bharatpur) के भुसावर (Bhusawar) में होली पर 250 साल पुरानी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जहां बिना दुल्हन के ‘होली का दुल्हा’ गधे या ऊंट पर बैठाकर बारात निकाली जाती है।

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भुसावर (विष्णुकुमार )

रंगों के त्योहार होली पर जहां पूरा देश गुलाल और उमंग में डूब जाता है, वहीं भुसावर कस्बा एक ऐसी अनोखी परंपरा का साक्षी बनता है, जिसे देखकर हर कोई हैरान रह जाता है। यहां होली के मौके पर ‘दुल्हा’ तो बनता है, बारात भी निकलती है, बैंड-बाजा भी बजता है—लेकिन न दुल्हन होती है और न ही सात फेरे। फिर भी यह परंपरा पिछले लगभग ढाई सौ वर्षों से पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।

ब्रज क्षेत्र में होली की शुरुआत बसंत पंचमी से ही हो जाती है और करीब 40 दिनों तक उत्सव का सिलसिला चलता है। इसी कड़ी में भुसावर की यह परंपरा विशेष पहचान रखती है। कस्बे के बुजुर्ग कुंजबिहारी शर्मा, टिल्लाराम पंजाबी, महेश चंद जति और पंडित राघवेंद्र शर्मा बताते हैं कि जिस युवक की शादी में बार-बार बाधाएं आ रही हों, उसे सर्वसम्मति से ‘होली का दुल्हा’ बनाया जाता है।

सिर पर जलती मटकी, गधे-ऊंट पर सवार होकर निकलती है बारात
होली का दूल्हा बने युवक को खिरकारी भगतराज से गधे या ऊंट पर बैठाया जाता है। उसके सिर पर अग्नि से प्रज्वलित मटकी रखी जाती है और गले में बलुरी-गिलुरी की माला पहनाई जाती है। इसके बाद बैंड-बाजे और जयघोष के साथ उसकी बारात कस्बे के प्रमुख मार्गों से होकर गुजरती है।

बारात में शामिल लोग चेहरे पर रंग-गुलाल लगाकर, हाथों में पदवेश लेकर नाचते-गाते हुए चलते हैं। पूरा माहौल उत्सव, हंसी और परंपरा के रंगों से सराबोर हो जाता है।

250 साल पुरानी परंपरा: जैन मंदिर में ‘तौरण’ और फिर रस्म के तौर पर पिटाई
यह अनोखी बारात जैन गली स्थित जैन मंदिर प्रांगण पहुंचती है, जहां मंदिर के मुख्य द्वार पर ‘तौरण’ की रस्म निभाई जाती है। इसके बाद परंपरा के अनुसार, होली के दुल्हा बने युवक की शगुन के तौर पर पदवेशों से प्रतीकात्मक पिटाई की जाती है।

यह रस्म इस मान्यता के साथ निभाई जाती है कि इससे युवक के विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और शीघ्र ही उसके जीवन में वैवाहिक सुख का आगमन होता है।

बिना दुल्हन, बिना फेरे… फिर भी पूरी होती है बारात
इस अनोखी बारात में न तो दुल्हन होती है और न ही फेरे लिए जाते हैं। रस्म पूरी होने के बाद बारात भगवान से अगले वर्ष फिर मिलने का संकल्प लेकर एक-दूसरे को होली की शुभकामनाएं देती है और उत्सव का समापन होता है।

भुसावर में होली के अवसर पर जगह-जगह होलिका दहन भी किया जाता है। परंपरा, आस्था और उल्लास का यह अद्भुत संगम न केवल भुसावर की सांस्कृतिक पहचान है, बल्कि ब्रज की जीवंत लोक परंपराओं का भी अनमोल उदाहरण है।

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