भरतपुर (Bharatpur) का केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park), जिसे कभी पक्षियों का स्वर्ग और जैव विविधता का जीता-जागता उदाहरण कहा जाता था, अब धीरे-धीरे शहरीकरण की आक्रामक लहर में अपनी पहचान खोता जा रहा है।
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर और स्थानीय पार्षद दीपक मुदगल की आंखों से देखी गई यह त्रासदी सिर्फ तस्वीरों तक सीमित नहीं, बल्कि एक जीवंत संकट बन चुकी है। भरतपुर विकास प्राधिकरण की आवासीय योजनाएं, सड़कों का अंधाधुंध विस्तार, बिजली के तारों का जाल और सीमेंट से की गई घेराबंदी ने पक्षियों के पारंपरिक प्राकृतिक आवास को धीरे-धीरे निगल लिया है।
भारतीय सारस, जो कभी जलभराव और दलदली इलाकों में खुले पंखों से नाचते थे, आज भोजन और पानी की तलाश में भटकते फिर रहे हैं। कई प्रजातियां तो अब केवलादेव से मीलों दूर चली गई हैं, और कुछ शायद कभी लौटें भी नहीं।
दीपक मुदगल कहते हैं- ‘यह सिर्फ भूमि का नहीं, जैव विविधता की आत्मा का हनन है’। उनका मानना है कि अगर अभी भी सरकार, स्थानीय समुदाय और संरक्षण संगठन मिलकर पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करने और आवास की सुरक्षा के ठोस कदम नहीं उठाते, तो वह दिन दूर नहीं जब केवलादेव का नाम केवल इतिहास और फोटो एलबमों में बचा रह जाएगा।
यह संकट सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि भावी पीढ़ियों की सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहर का भी है। पक्षियों की चहचहाहट के बिना भरतपुर की पहचान अधूरी है और अगर यह मौन हो गई — तो यह मौन सिर्फ पक्षियों का नहीं, हमारी संवेदनाओं का होगा।
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