मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव (Middle East Crisis) के बीच समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबल्स पर खतरे की आशंका। भारत सरकार ने जियो, एयरटेल और टाटा कम्युनिकेशंस से बैकअप प्लान मांगा, इंटरनेट स्पीड प्रभावित होने की चिंता।
नई दिल्ली
सोचिए, आप मोबाइल खोलें और सोशल मीडिया लोड होने में वक्त लगे… ऑनलाइन पेमेंट अटक जाए… या वीडियो कॉल बार-बार रुकने लगे। यह कोई तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर समुद्र के नीचे बिछे उस नेटवर्क का असर हो सकता है, जिस पर दुनिया का इंटरनेट टिका हुआ है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध जैसे हालात ने अब उसी नेटवर्क को लेकर चिंता बढ़ा दी है। भारत सरकार को डर है कि अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा तो समुद्र के नीचे गुजरने वाली इंटरनेट केबल्स प्रभावित हो सकती हैं—और उसका असर सीधे भारत के इंटरनेट ट्रैफिक पर पड़ेगा।
सैटेलाइट नहीं, समुद्र के नीचे से आता है इंटरनेट
ज्यादातर लोग मानते हैं कि इंटरनेट सैटेलाइट से आता है, लेकिन असल कहानी कुछ और है। दुनिया का बड़ा हिस्सा सबमरीन फाइबर केबल्स के जरिए जुड़ा हुआ है। ये केबल्स समुद्र की गहराई में बिछी होती हैं और महाद्वीपों के बीच डेटा का विशाल ट्रैफिक ढोती हैं।
भारत में जो इंटरनेट आप मोबाइल या लैपटॉप पर इस्तेमाल करते हैं, उसका बड़ा हिस्सा भी इन्हीं समुद्री रास्तों से होकर आता है।
अचानक क्यों बढ़ी सरकार की चिंता
पश्चिम एशिया में तनाव के बीच सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों को अलर्ट कर दिया है। दूरसंचार विभाग ने रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और टाटा कम्युनिकेशंस जैसी कंपनियों के साथ इमरजेंसी बातचीत शुरू की है।
कंपनियों से साफ कहा गया है कि अगर किसी वजह से समुद्र के रास्ते आने वाला डेटा रुकता है, तो उसे दूसरे नेटवर्क रूट से भेजने की तैयारी रखी जाए। साथ ही उनसे यह भी पूछा गया है कि उनके पास ऐसे हालात के लिए कौन-कौन से बैकअप विकल्प मौजूद हैं।
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अगर रास्ता बदला तो इंटरनेट भी बदलेगा
तकनीकी रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत तक आने वाला डेटा आमतौर पर पश्चिमी समुद्री रास्तों से गुजरता है। अगर यह रास्ता बाधित हुआ तो ट्रैफिक को सिंगापुर की दिशा से घुमाकर प्रशांत महासागर के लंबे मार्ग से लाना पड़ सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि इंटरनेट बंद हो जाएगा, लेकिन रास्ता लंबा होने की वजह से डेटा को ज्यादा दूरी तय करनी पड़ेगी। नतीजा—
- वेबसाइट्स थोड़ा देर से खुल सकती हैं
- क्लाउड सर्विसेज में लैग आ सकता है
- और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन में अतिरिक्त समय लग सकता है।
कुछ अहम केबल्स पहले से ही जोखिम में
समुद्र में बिछी कई प्रमुख केबल्स को लेकर पहले से ही चिंता जताई जा रही है। इनमें एयरटेल की SEA-ME-WE-4 और टाटा कम्युनिकेशंस की TATA TGN-Gulf जैसी लाइनें शामिल हैं।
बताया जा रहा है कि जेद्दा के पास एक कटी हुई केबल को ठीक करने का काम भी अटका हुआ है क्योंकि मौजूदा हालात में मरम्मत करने वाले जहाज वहां आसानी से काम नहीं कर पा रहे।
भारत के डिजिटल प्लान पर भी असर?
अगर समुद्री केबल्स का संकट लंबा खिंचता है तो इसका असर सिर्फ इंटरनेट स्पीड तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत के लगभग 270 अरब डॉलर के डेटा सेंटर विस्तार मिशन पर भी दबाव पड़ सकता है।
इसी बीच बड़ी टेक कंपनियों द्वारा भारत के लिए नई समुद्री केबल बिछाने की योजनाएं भी फिलहाल अनिश्चितता में फंसती दिख रही हैं।
पूरी तरह अंधेरा नहीं, लेकिन झटका संभव
इंडस्ट्री एक्सपर्ट साफ कहते हैं कि इंटरनेट का पूरा ब्लैकआउट होना बेहद मुश्किल है। कंपनियों के पास सामान्य तकनीकी खराबी से निपटने की व्यवस्था रहती है। लेकिन युद्ध जैसे असामान्य हालात में सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि नेटवर्क को सुरक्षित रखा जाए और डेटा का ट्रैफिक लगातार चलता रहे। इसी वजह से टेलीकॉम कंपनियां भी चाहती हैं कि सरकार पश्चिम एशिया के देशों से बातचीत कर इन समुद्री केबल्स की सुरक्षा सुनिश्चित करवाए।
दुनिया की डिजिटल लाइफलाइन कही जाने वाली ये केबल्स भले समुद्र की गहराई में छिपी हों, लेकिन उनका असर हमारी जेब में रखे मोबाइल तक महसूस होता है—और अभी वही नेटवर्क दुनिया की सबसे संवेदनशील जगहों में से एक के करीब गुजर रहा है।
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