भरतपुर में पानी निकालने का इंतजाम तो हुआ, लेकिन बारिश का पानी बचाने का हिसाब कौन देगा?

भरतपुर में मास्टर ड्रेनेज प्रोजेक्ट, पुराने जल मार्गों और फ्लड कंट्रोल ड्रेन के कनेक्शनों पर तकनीकी सवाल उठे हैं। वर्षा जल संरक्षण और ड्रेनेज व्यवस्था की समीक्षा जरूरी।

संत कौशिक | स्वतंत्र पत्रकार

भरतपुर। बारिश के दिनों में शहर को जलभराव से बचाना जरूरी है, लेकिन क्या पानी की निकासी का इंतजाम करते समय यह भी देखा गया कि बारिश का साफ पानी भविष्य के लिए कितना बच पाएगा? भरतपुर में मास्टर ड्रेनेज प्रोजेक्ट और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं को लेकर अब यही सवाल उठ रहा है। ओम चैतन्य जल मिशन के सीईओ सुरेश मित्तल ने शहर के पुराने जल प्रवाह मार्गों और नए ड्रेनेज कनेक्शनों की तकनीकी समीक्षा की जरूरत बताई है। उनका सवाल है कि कहीं जल निकासी की व्यवस्थाओं में ऐसे बदलाव तो नहीं हुए, जिनसे स्वच्छ वर्षा जल और प्रदूषित पानी के प्रवाह के बीच का अंतर प्रभावित हो सकता है?

इस बहस का केंद्र सिर्फ शहर के नाले नहीं हैं। भरतपुर की पारंपरिक जल व्यवस्था, अजान बांध, मोती झील और सुजान गंगा नहर से जुड़े वे रास्ते भी हैं, जिनके जरिए वर्षा जल का संचयन और एक स्थान से दूसरे स्थान तक प्रवाह होता रहा है। अब इन पुराने रास्तों और मौजूदा ड्रेनेज नेटवर्क के बीच तालमेल की वास्तविक स्थिति सामने लाने की जरूरत महसूस की जा रही है।

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पुराने जल स्रोतों से नए ड्रेनेज नेटवर्क तक पहुंची बात

सुरेश मित्तल ने भरतपुर के जल तंत्र में अजान बांध से रामनगर, दोमोरा कैनाल, अटल बंध, रामकोट और कानकोट तालाब होते हुए सुजान गंगा नहर तक वर्षा जल पहुंचने की व्यवस्था का उल्लेख किया है। मोती झील से गिरिराज कैनाल, डायवर्जन और झूला माइनर फीडर के जरिए सुजान गंगा नहर को पानी मिलने का रास्ता भी इसी व्यवस्था का हिस्सा बताया गया है।

इन जल मार्गों का महत्व केवल पानी की आवाजाही नहीं, बल्कि वर्षा जल के संचयन और जल निकायों के पुनर्भरण से भी जुड़ा है। ऐसे में शहर के ड्रेनेज नेटवर्क में हुए बदलावों को समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि पुराने जल मार्गों की भूमिका को नई योजनाओं में किस तरह शामिल किया गया।

यदि इन व्यवस्थाओं का तकनीकी आकलन किए बिना बदलाव किए गए हों, तो उनकी उपयोगिता और संभावित प्रभावों की जांच जरूरी होगी। हालांकि, ऐसा हुआ है या नहीं, इसका फैसला संबंधित परियोजनाओं के रिकॉर्ड और तकनीकी परीक्षणों के आधार पर ही किया जा सकता है।

शहर के ड्रेनेज को किन जल मार्गों से जोड़ा गया?

मित्तल ने रणजीत नगर फ्लड कंट्रोल ड्रेन (RNFCD) को अजान-मुरवारा कैनाल से जोड़ने और झूला माइनर फीडर को गोकुल नगर के पास इंटरकनेक्ट करने का मुद्दा उठाया है। उनके अनुसार, रणजीत नगर फ्लड कंट्रोल ड्रेन के पक्के निर्माण के बाद रणजीत नगर, सेक्टर-03 और एसपीएम नगर के ड्रेनेज को भी इससे जोड़ा गया। इसके साथ सीएफसीडी की चैन 167 को जघीना गेट सड़क पार कर जोड़ने की व्यवस्था पर भी उन्होंने तकनीकी सवाल उठाए हैं।

इन व्यवस्थाओं का मूल्यांकन करने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कनेक्शन बनाए गए या नहीं। यह जानना भी जरूरी है कि उनकी डिजाइन किस आधार पर तैयार हुई, पानी की निकासी के लिए कितनी क्षमता निर्धारित की गई और अलग-अलग स्रोतों से आने वाले पानी के आपसी प्रभावों का अध्ययन किया गया या नहीं।

जल प्रवाह की दिशा, बैकफ्लो की संभावना और आसपास के जल निकायों पर पड़ने वाले प्रभाव जैसे पहलुओं की जानकारी तकनीकी रिपोर्टों से मिल सकती है। इसलिए संबंधित विभागों के पास उपलब्ध डिजाइन, स्वीकृति और परीक्षण संबंधी दस्तावेज इस पूरे मामले में अहम होंगे।

झूला माइनर फीडर गोकुल बस्ती

बारिश के पानी और ड्रेनेज के आंकड़ों का मिलान जरूरी

सुरेश मित्तल की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों में यूआईटी परिधि क्षेत्र में सालाना औसतन 1.35 लाख मिलियन लीटर वर्षा जल उपलब्ध होने का अनुमान है। वहीं, लगभग 13,797 मिलियन लीटर सालाना ड्रेनेज जल उत्पन्न होने की बात कही गई है। इन आंकड़ों के आधार पर वर्षा जल और ड्रेनेज जल का अनुपात करीब 10:1 बताया गया है। इन आंकड़ों की गणना किस पद्धति से की गई और उनका आधार क्या है, इसकी स्वतंत्र तकनीकी पुष्टि आवश्यक है। फिर भी, ये आंकड़े शहर के जल प्रबंधन की प्राथमिकताओं पर विचार करने का अवसर देते हैं।

मूल प्रश्न यह है कि उपलब्ध वर्षा जल का कितना हिस्सा जल निकायों तक पहुंचता है, कितना जमीन में समाता है और कितना निकासी व्यवस्था के जरिए बाहर निकल जाता है। इसी तरह यह जानना भी जरूरी है कि प्रदूषित ड्रेनेज को स्वच्छ वर्षा जल के प्रवाह से अलग रखने के लिए कौन-से इंतजाम किए गए हैं।

जलभराव से राहत का आकलन सिर्फ नालों से नहीं होगा

किसी ड्रेनेज परियोजना की सफलता का पैमाना केवल नालों का निर्माण या पानी बाहर निकालने की क्षमता नहीं हो सकता। यह भी देखना होगा कि जलभराव की समस्या में कितनी कमी आई और इस व्यवस्था का वर्षा जल संरक्षण तथा जल निकायों पर क्या असर पड़ा। प्रदूषित पानी का उचित शोधन कर उसका गैर-पेय उपयोगों में दोबारा इस्तेमाल करना और स्वच्छ वर्षा जल को संचयन तथा भूजल पुनर्भरण के लिए सुरक्षित रखना अलग-अलग जरूरतें हैं। शहर की जल व्यवस्था में दोनों के लिए पर्याप्त प्रबंध होना जरूरी है।

भरतपुर में मौजूदा कनेक्शनों के कारण वास्तव में कोई तकनीकी या पर्यावरणीय समस्या पैदा हुई है या नहीं, इसका निष्कर्ष उपलब्ध तथ्यों के परीक्षण के बाद ही निकाला जा सकता है। लेकिन इस सवाल का जवाब टालने के बजाय तकनीकी दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।

रणजीत नगर फ्लड कन्ट्रोल ड्रेन

अब विभागों के दस्तावेज बताएंगे व्यवस्था कितनी कारगर

जिला प्रशासन, नगर निगम, भरतपुर विकास प्राधिकरण और संबंधित तकनीकी विभागों के सामने अब परियोजना की वास्तविक कार्यक्षमता स्पष्ट करने की जरूरत है। मास्टर ड्रेनेज प्रोजेक्ट की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR), जल प्रवाह का अध्ययन, ड्रेनेज कनेक्शनों का विवरण, निर्धारित क्षमता और निर्माण के बाद किए गए परीक्षण सामने आने से मौजूदा व्यवस्था का निष्पक्ष आकलन हो सकेगा।

इन दस्तावेजों से यह भी समझा जा सकेगा कि पुराने जल तंत्र को ध्यान में रखते हुए नए निर्माण किए गए या नहीं और स्वच्छ वर्षा जल के संरक्षण को कितनी प्राथमिकता मिली।

भरतपुर के सामने चुनौती केवल बारिश के पानी को शहर से बाहर निकालने की नहीं, बल्कि जलभराव से राहत और जल संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की भी है। सुरेश मित्तल की ओर से उठाए गए सवालों पर संबंधित विभागों का तकनीकी पक्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि मौजूदा व्यवस्था अपने उद्देश्यों को कितनी प्रभावी ढंग से पूरा कर रही है।

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