8 साल बाद मिला इंसाफ, गूंगी-बहरी महिला के कातिल को उम्रकैद | टापरी में मिली थी लाश, शरीर पर थे बेरहमी के निशान

बारां के केलवाड़ा क्षेत्र में गूंगी-बहरी महिला की हत्या मामले में 8 साल बाद अदालत ने आरोपी नरेश को उम्रकैद की सजा सुनाई। टापरी में महिला का शव मिला था, जिस पर चोटों के गंभीर निशान थे।

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बारां 

बारां जिले के केलवाड़ा थाना क्षेत्र में गूंगी-बहरी महिला की हत्या के सनसनीखेज मामले में आखिरकार 8 साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। एससी-एसटी न्यायालय ने हत्या के दोषी नरेश को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए हजारों रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

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यह मामला जून 2017 का है, जब जैतपुरा निवासी एक व्यक्ति ने केलवाड़ा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी कि उसकी पत्नी अचानक घर से लापता हो गई है। परिवादी ने पुलिस को बताया था कि 19 जून 2017 की शाम वह मछली पकड़ने नदी पर गया था। रात करीब 8 बजे घर लौटा तो पत्नी घर पर नहीं मिली। उसने रिश्तेदारों और आसपास के लोगों से तलाश की, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला।

दो दिन बाद 21 जून की सुबह गांव में सनसनी फैल गई। गांव के प्रेमनारायण ने परिवादी को सूचना दी कि उसके बाड़े में बनी टापरी के अंदर एक महिला की लाश पड़ी हुई है। सूचना मिलते ही परिवादी और ग्रामीण मौके पर पहुंचे। वहां का दृश्य देखकर हर कोई सन्न रह गया।

टापरी में पड़ी महिला की लाश पर जगह-जगह चोटों के निशान थे। मुंह, कोहनी और दाहिनी आंख से खून निकल रहा था, जबकि गले में लुगड़ी का फंदा लगा हुआ था। मृतका गूंगी और बहरी थी, जिससे पूरे मामले ने और भी संवेदनशील रूप ले लिया।

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पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की और अनुसंधान के बाद आरोपी नरेश पुत्र भगवान सिंह निवासी जैतपुरा के खिलाफ हत्या और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत अदालत में चालान पेश किया।

मामले की सुनवाई विशिष्ट न्यायाधीश एससी-एसटी न्यायालय लोकेश शर्मा की अदालत में हुई। अभियोजन पक्ष की ओर से विशिष्ट लोक अभियोजक हरिओम मीणा ने पैरवी करते हुए 12 गवाह और 50 दस्तावेज अदालत के सामने पेश किए।

सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने आरोपी नरेश (33) को धारा 302 भादंसं के तहत आजीवन कारावास और 40 हजार रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई। वहीं एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(1) के तहत भी आरोपी को उम्रकैद और 20 हजार रुपए जुर्माने से दंडित किया गया। जुर्माना जमा नहीं कराने की स्थिति में अलग से 6 माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।

करीब आठ साल तक चले इस मामले में आए फैसले को पीड़ित परिवार के लिए बड़ी न्यायिक राहत माना जा रहा है।

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