भरतपुर में करीब दो साल से खुदी सड़कें, गड्ढे, धूल और कीचड़ से लोग परेशान हैं। निर्माण कार्यों में तालमेल, समयसीमा और विभागों की जवाबदेही पर सवाल।
भरतपुर। शहर में कहीं सड़क खोदी जा रही है, कहीं गड्ढे रास्ता रोक रहे हैं और कहीं उड़ती धूल ने दुकानदारों व राहगीरों का जीना मुश्किल कर रखा है। एक तरफ सीवर, पेयजल, गैस पाइपलाइन और बिजली केबल जैसे काम चल रहे हैं, दूसरी तरफ आम आदमी के सामने रोज का सवाल है—आखिर निकलें तो किस रास्ते से? भरतपुर में विकास परियोजनाओं की यह तस्वीर कोई एक-दो दिन की परेशानी नहीं है। करीब दो साल से शहर के प्रमुख मार्गों से लेकर कॉलोनियों तक लोगों को उखड़ी सड़कों, कीचड़, मलबे और अव्यवस्थित रास्तों के बीच गुजरना पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के गृह जिले में करीब साढ़े तीन लाख आबादी वाले शहर की यह स्थिति कई सवाल खड़े करती है। विकास कार्य जरूरी हैं, लेकिन क्या उन्हें इस तरह किया जाना चाहिए कि लोगों का सामान्य आवागमन ही मुश्किल बन जाए? और जब परेशानी लगातार बनी हुई है, तो इसकी जिम्मेदारी आखिर किसकी है?
सर्कुलर रोड से स्टेशन रोड तक, हर तरफ रास्तों की परीक्षा
भरतपुर में परेशानी किसी एक इलाके तक सीमित नहीं है। सर्कुलर रोड, हीरादास से सेवर रोड, नुमाइश रोड, कुम्हेर गेट से स्टेशन रोड और डीग रोड पर निर्माण कार्यों ने आवाजाही को प्रभावित किया है। बिजलीघर से काली की बगीची रोड और स्टेशन रोड पर फ्लाईओवर निर्माण भी यातायात के लिए चुनौती बना हुआ है। शहर के चारों ओर कच्ची खाई में सीएफसीडी के तहत पक्के नाले का निर्माण भी चल रहा है।
शहर में एक साथ कई तरह के काम होने से सड़कों की खुदाई का दायरा बढ़ा है। कहीं सीवर लाइन बिछ रही है, कहीं पेयजल लाइन डाली जा रही है, तो कहीं गैस पाइपलाइन, भूमिगत बिजली केबल और फाइबर केबल के लिए सड़कें खोदी जा रही हैं। नाले-नालियों के निर्माण और सड़क चौड़ीकरण के काम भी इसी तस्वीर का हिस्सा हैं।
लेकिन असली सवाल परियोजनाओं की संख्या नहीं, उनके संचालन का तरीका है। क्या काम शुरू करने से पहले संबंधित विभागों ने आपस में तालमेल बनाया? क्या लोगों के लिए सुरक्षित वैकल्पिक रास्ते तय किए गए? क्या खुदाई के बाद सड़क को समय पर बहाल करने की व्यवस्था है? शहर की मौजूदा स्थिति इन सवालों को नजरअंदाज करने की गुंजाइश नहीं छोड़ती।
गड्ढों और धूल के बीच रोजमर्रा की जिंदगी
खुदाई के बाद रास्तों को व्यवस्थित नहीं किया जाना परेशानी को और बढ़ा रहा है। कहीं गहरे गड्ढे हैं, कहीं मिट्टी और निर्माण मलबा जमा है। कई स्थानों पर उड़ती धूल से दुकानदार, स्थानीय निवासी और दोपहिया वाहन चालक परेशान हैं। गंदगी से भरे नाले-नालियों और जगह-जगह जमा कचरे से दुर्गंध की समस्या भी सामने आती है।
एक विभाग काम करे, दूसरा सड़क खोद दे—समन्वय कहां है?
शहर की समस्या का एक बड़ा सवाल विभिन्न विभागों के बीच तालमेल से जुड़ा है। जलदाय विभाग, विद्युत विभाग, नगर निगम, भरतपुर विकास प्राधिकरण, सार्वजनिक निर्माण विभाग और आरयूआईडीपी जैसी एजेंसियों के काम कई जगह एक-दूसरे से जुड़े हैं।
ऐसे में यदि सड़क बनाने और पाइपलाइन या केबल डालने के कामों के बीच समन्वय नहीं हो, तो परेशानी का खामियाजा नागरिकों को भुगतना पड़ता है। एक विभाग के काम के बाद दूसरे विभाग की खुदाई और फिर सड़क की मरम्मत में देरी—ऐसी स्थिति को रोकने के लिए साझा कार्ययोजना और प्रभावी निगरानी जरूरी है।
यहां सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कौन-सा काम चल रहा है। सवाल यह भी है कि काम कब पूरा होना है, उसकी निगरानी कौन कर रहा है और निर्धारित समयसीमा पीछे छूटने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी। निर्माण की गुणवत्ता, समयबद्धता, यातायात प्रबंधन और सुरक्षा इंतजामों की निगरानी संबंधित अधिकारियों का दायित्व है। संवेदकों के काम की समीक्षा और तय शर्तों के पालन की जांच भी जरूरी है। यदि कहीं काम अनावश्यक रूप से लंबा खिंच रहा है, तो उसके कारण सामने आने चाहिए और नियमानुसार जवाबदेही तय होनी चाहिए।
निरीक्षण से आगे बढ़े प्रशासन, सड़क पर दिखे बदलाव
भरतपुर के लोगों को अब केवल काम चलने की जानकारी नहीं, बल्कि उसके पूरा होने की स्पष्ट समयसीमा चाहिए। प्रशासन को संबंधित विभागों और निर्माण एजेंसियों के साथ शहर के कार्यों की संयुक्त समीक्षा करनी चाहिए। कौन-सी परियोजना किस चरण में है, उसे कब तक पूरा किया जाना है और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है—इन सवालों पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
जहां खुदाई हो चुकी है, वहां सबसे पहले सुरक्षित आवागमन सुनिश्चित करना जरूरी है। गहरे गड्ढों को सुरक्षित किया जाए, जरूरत के मुताबिक वैकल्पिक रास्ते बनाए जाएं, धूल कम करने के लिए पानी का नियमित छिड़काव हो और निर्माण मलबे को समय पर हटाया जाए। काम पूरा होने के बाद सड़कों की मरम्मत में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। खुले निर्माण स्थलों पर सुरक्षा व्यवस्था और नाले-नालियों की सफाई पर भी ध्यान देना होगा। ये ऐसे इंतजाम हैं जिनका असर नागरिकों को सीधे दिखाई दे सकता है। बैठकों और निर्देशों का महत्व तभी है, जब उनके बाद सड़क पर हालात बदलें।
विकास का हिसाब जनता को राहत से चाहिए
भरतपुर में चल रही परियोजनाएं शहर की जरूरतों से जुड़ी हो सकती हैं, लेकिन उनके नाम पर लोगों को लंबे समय तक अव्यवस्थित रास्तों के बीच छोड़ देना उचित नहीं ठहराया जा सकता। विकास का उद्देश्य सुविधाएं बढ़ाना है, न कि नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन को लगातार मुश्किल बनाना। अब शहर के लोग जानना चाहते हैं कि खुदी सड़कें कब दुरुस्त होंगी, धूल और मलबे से कब छुटकारा मिलेगा और अलग-अलग विभागों के कामों में तालमेल कब दिखाई देगा।
इस अव्यवस्था का असर सिर्फ सड़क पर चलने वालों तक नहीं रहता। बच्चों के स्कूल जाने, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने, बुजुर्गों की आवाजाही और दुकानों के रोजमर्रा के कामकाज पर भी ऐसी परिस्थितियों का असर पड़ता है। सड़क का खराब होना किसी के लिए रास्ता बदलने की मजबूरी है, तो किसी के लिए समय और सुरक्षा से जुड़ी चिंता।
घर से काम के लिए निकला व्यक्ति सुरक्षित वापस लौटेगा या नहीं, इसकी फिक्र परिजनों को बनी रहती है। जब सड़क पर सामान्य आवाजाही भी परेशानी और जोखिम से जुड़ने लगे, तब विकास के दावों के साथ नागरिकों की सुरक्षा पर भी बात होनी चाहिए।
मुख्यमंत्री के गृह जिले में उठ रहा सवाल साफ है—विकास कार्यों की समयसीमा और जिम्मेदारी तय होगी, या भरतपुर की जनता यूं ही गड्ढों, धूल और कीचड़ के बीच रास्ता तलाशती रहेगी?
शहर को सिर्फ नई परियोजनाओं की नहीं, उन्हें समय पर पूरा करने और काम के दौरान नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था की जरूरत है। विकास की असली कसौटी यही है कि उसके पूरा होने तक जनता को कितनी राहत मिलती है और जिम्मेदार एजेंसियां अपने काम के प्रति कितनी जवाबदेह रहती हैं।
नई हवा खबरें अपने मोबाइल पर नियमित और डायरेक्ट प्राप्त करने के लिए व्हाट्सएप नंबर 9460426838 सेव करें और ‘Hi’ और अपना नाम, स्टेट और सिटी लिखकर मैसेज करें। आप अपनी खबर या रचना भी इस नंबर पर भेज सकते हैं।
छोटे बच्चों की सेहत से खिलवाड़ पर लगेगी लगाम? FSSAI का बड़ा कदम
एक बिस्तर पर पिता-बेटा, दूसरे पर मां-बेटियां… सुबह खुला दरवाजा तो सामने था खौफनाक मंजर
महाकाल के दर्शन किए, खाटू श्याम पहुंचने से पहले मौत ने घेरा, कोटा में 8 की सांसें थमीं
