कुम्हेर बाल विकास परियोजना में अतिरिक्त कार्यभार और नई प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर असमंजस बढ़ गया है। 1994 से PPP मॉडल पर चल रही परियोजना को लेकर कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप मांगा है।
कुम्हेर/डीग (रामचरण धाकड़)। करीब 32 साल से एक गैर सरकारी संगठन के जरिए चल रही कुम्हेर बाल विकास परियोजना अचानक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां परियोजना के संचालन से ज्यादा सवाल अब यह उठ रहा है कि फिलहाल इसका प्रशासनिक नियंत्रण किस व्यवस्था के तहत चलेगा। एक तरफ परियोजना की संचालन अवधि बढ़ाने की पत्रावली राज्य सरकार के पास विचाराधीन बताई जा रही है, दूसरी ओर विभागीय स्तर पर अतिरिक्त कार्यभार को लेकर जारी आदेशों ने कर्मचारियों और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की उलझन बढ़ा दी है।
मामला उस समय और पेचीदा हो गया, जब निदेशालय ने बाल विकास परियोजना अधिकारी, नगर को केवल आहरण एवं वितरण कार्य के लिए अतिरिक्त कार्यभार सौंपा। आरोप है कि इस आदेश की व्यापक व्याख्या करते हुए उपनिदेशक महिला एवं बाल विकास विभाग, डीग ने डीग परियोजना के स्टाफ को कुम्हेर परियोजना के दूसरे प्रशासनिक कामों का भी अतिरिक्त कार्यभार देने के आदेश जारी कर दिए।
अब परियोजना से जुड़े कार्मिकों के सामने सवाल है कि जब सरकार ने अभी संचालन अवधि बढ़ाने पर अंतिम फैसला ही नहीं किया है, तो नई प्रशासनिक व्यवस्था आखिर किस आधार पर लागू की जा रही है?
बिना हस्ताक्षर की सूचियां और मौखिक निर्देशों ने बढ़ाई परेशानी
परियोजना से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि महिला पर्यवेक्षकों को बिना हस्ताक्षर वाली सूचियां उपलब्ध कराकर संबंधित सेक्टरों में काम करने के मौखिक निर्देश दिए जा रहे हैं। वहीं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं विधिवत एवं स्पष्ट आदेश के अभाव में नई व्यवस्था को लेकर असमंजस में हैं।
मेवात क्षेत्र में ऑनलाइन फ्रॉड की घटनाओं का हवाला देते हुए कई कार्यकर्ता बिना अधिकृत आदेश के विभागीय सूचनाएं साझा करने में भी सावधानी बरत रही हैं। ऐसे में मौखिक निर्देश और बिना हस्ताक्षर वाली सूचियों ने स्थिति को और उलझा दिया है।
असली पेच यहां है—पुराने कार्मिकों का क्या होगा?
कुम्हेर परियोजना में आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं की नियुक्तियां संबंधित संस्था के माध्यम से हुई हैं। ऐसे में यदि इन कार्मिकों को नई व्यवस्था में यथावत रखा जाता है, तो संस्था के कार्यालयीन स्टाफ को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
परियोजना से जुड़े लोगों के मुताबिक संस्था के अधीन परियोजना अधिकारी, लेखाकार, वरिष्ठ सहायक, कनिष्ठ सहायक, महिला पर्यवेक्षक और अन्य सहायक कर्मचारी वर्षों से काम कर रहे हैं। ऐसे में प्रशासनिक व्यवस्था बदलने की स्थिति में इन पदों और कर्मचारियों की भूमिका क्या होगी, यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
सरकार के फैसले तक पुरानी व्यवस्था जारी रखने की मांग
परियोजना से जुड़े कर्मचारियों का कहना है कि वर्ष 1994 से PPP मॉडल पर संचालित कुम्हेर बाल विकास परियोजना के लिए फिलहाल कोई स्पष्ट और व्यवहारिक वैकल्पिक व्यवस्था सामने नहीं है। संचालन अवधि बढ़ाने का मामला राज्य सरकार के स्तर पर लंबित है।
ऐसे में उनका तर्क है कि जब तक सरकार इस पर अंतिम निर्णय नहीं लेती, तब तक मौजूदा संस्था के माध्यम से परियोजना का संचालन जारी रखना ही व्यावहारिक विकल्प होगा। इससे आंगनवाड़ी सेवाओं का काम भी बाधित नहीं होगा और वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों के सामने रोजगार का संकट भी नहीं खड़ा होगा।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
परियोजना से जुड़े कर्मचारियों ने मुख्यमंत्री से मामले में हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने राज्य सरकार से संचालन अवधि बढ़ाने संबंधी लंबित प्रकरण का शीघ्र निस्तारण करने तथा तब तक पैदा हुए प्रशासनिक असमंजस को दूर करने के लिए स्पष्ट और विधिवत दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।
फिलहाल पूरा मामला इस बात पर टिका है कि राज्य सरकार कुम्हेर परियोजना की आगे की व्यवस्था को लेकर क्या फैसला करती है। तब तक अलग-अलग स्तर से जारी आदेश और मौखिक निर्देश परियोजना से जुड़े कार्मिकों की परेशानी बढ़ाते रहेंगे, या सरकार कोई स्पष्ट रास्ता निकालती है—इस पर सबकी नजर है।
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