छांव की तलाश…

वटवृक्ष

डॉ. अलका अग्रवाल, सेवानिवृत कालेज प्राचार्य  


छांव की तलाश
कब से तलाश रही हूँ छाँव
मिल जाए कोई बरगद
उसकी दूर दूर तक फैली
शीतल छाया में,
कुछ पल सुस्ता ही लूँ।

पर खोज आज तक जारी ही रही।
कोई विशाल वटवृक्ष न मिलना था
ना ही मिला।
शायद यूँ ही चलता रहता यह सिलसिला।

पर अचानक खुल गए मेरे प्रज्ञाचक्षु।
मैंने स्वयं से कहा,
क्यों मारा -मारा फिरता है
तू स्वयं ही विशाल वृक्ष क्यों नहीं बन जाता
जिसकी घनी छाँव में राही सुस्ता सकें
चार पल आराम के बिता सकें।

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